Life of Mr. P.K. Vatsalya Ji

आदरणीय श्री प्रमोद कुमार वात्सल्य जी का जीवन परिचय

आदरणीय श्री प्रमोद कुमार वातसल्य जी का जन्म 16 जनवरी 1940 के राजा का रामपुर जिला एटा उत्तर प्रदेश में हुआ आपके पिता जी का नाम स्व0 श्री थ्रीधर वात्सल्य जी एवं स्नेहमयी माता का नाम स्व0 श्रीमति शोभारानी था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा फर्रूखाबाद, मैनपुरी, इटावा, कानपुर, बडौत (मुजफ्फर नगर) आदि जगहो पर हुयी। आगरा विश्वविद्यालय से आपने कृषि में स्नातोकोत्तर के पश्चात आपका उत्तर प्रदेश राज्य सरकार के कृषि विभाग में चयन हो गया और अगले दस वर्षो तक आप उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों में जिसमें अलीगढ, देवरिया यकराता (देहरादून) घनौल्टी (टिहरी गढवाल) मसूरी में कार्य किया पर जो व्यक्ति समाज और विश्व के लिए कुछ अनोखा करने के लिए आया हो वह इन सब उलझनों में कैसे ज्यादा दिन टिका रह सकता। राजकीय सेवा में गुलाम मानसिकता की प्रबलता, कामचोरी, हरामखोरी, अव्यवस्था को देखते हुये उनका अंर्तमन विद्रोही हो उठता था, जैसै-तैसे 10 वर्ष तक का राजकीय सेवा करने के बाद उन्होंने नौकरी से अपने आपको मुक्त कर लिया।

सामान्य जन जहाॅ जीवन के लिए दिन-रात संघर्षरत हैं, सत्यशोधक वात्सल्य जी लगभग पांच दषक तक एकांत सेवन, लेखन, मनन, देश-विदेश, का भ्रमण करते रहे। पिता प्रखर गांधीवादी थे, इसी संस्कार के प्रभाव से वे पहले ’’एकला चलो रे’’ के सिद्धांत अनुसार अपने इस अभियान में खुद सेनापति और सैनिक की भूमिका में दिन-रात लगे रहे। बुद्धि व्यायाम में लगे रहते थे। दुनियां के तमाम विचारकों को पढने-समझने के उपरान्त यह बात समझ में आ सकी कि आखिरकार समग्र अव्यवस्था का कारण अप्राकृतिक मानव का स्वकीय व्यवस्था का विकल्प है ब्रह्मणीय प्राकृतिक व्यवस्था।

प्रकृति की समान वितरण प्रणाली को देखते हुए वे अभिभूत हो उठते थे, और साथ ही चिंतन यही चलता था यदि इस विशाल ब्रह्माण्ड में बिना किसी प्रकार के किसी व्यवधान के सब कुछ बडी कुशलता पूर्वक व्यवस्थित तरीके से अनादि समय से चलता आ रहा है, तो प्रकृति के एक घटक मानव समाज में यह व्यवस्था क्यों नहीं हैं। प्राकृतिक व्यवस्था तथा मानवीय व्यवस्था के अन्तः विरोध से वे सीधे मुठभेड करते हुए ’’ब्रह्माण्डीय व्यवस्था के तर्क सम्मत समाधान का शंखनाद करते हैं। वात्सल्य जी का ध्रुव वाक्य-अतित का सम्मान, वर्तमान को समाधान तथा भविष्य को दिशा देना ही मानवीय जीवन का सदमार्ग है। उनका क्रांतिकारी कथन है कि पूॅजीवाद और समाजवाद का चक्कर लगाना छोडो। धरती में सिवाय मनुष्य कोई भी प्राणी-कीट-पतंग भूखा नहीं रहता, भूखा नहीं मरता, अकाल मुत्यु को प्राप्त नहीं होता, रोग से काया को जर्जर नहीं होने देता तो मनुष्य समाज में उसकी व्यापकता का यथार्थता क्यों नही?

इन अनसुलझी प्रश्नवायी का निदान करते हुये वे ’’आर्थिक लोक स्वराज्य’’ का विचार उपस्थापित करते हैं। सीधे-सीधे मनुष्य को सर्व प्रथम भुख से छुटकारा दिलाने हेतु ’’प्रति व्यक्ति, प्रति महिने कम से कम दो हजार रूपये’’ जीवन सुरक्षा पेंशन अनिवार्यतः देने की बात का उद्घोषणा करने वाले प्रथम व्यक्ति हैं। जन-जन में जागृति लाने हेतू वे अभियान दीर्घ समय से चलाते आ रहे हैं। उसका नामकरण वह ’’व्यवस्था-परिवर्तन’’ रखे हुए हैं।

व्यवस्था परिवर्तन अभियान के वे ’’संरक्षक’’ हैं इस आंदोलन के माध्यम से बराबर प्रयासरत हैं कि देश की लोकसत्ता जागृत होकर समस्त अव्यवस्था की जननी, आज के अधिकार आधारित संविधान को बदला जाये। उसकी जगह कर्तव्य आधारित संविधान लागू किया जाये। भारतीय संविधान को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहते हैं कि जल्दवाजी में पश्चिम की अवधारणा का अधकचरा संविधान देश पर बलात थोपा गया है। कर्तव्य आधारित जीवन के वे प्रबल पक्षधर हैं। अधिकार के स्वाभाविक भाव को नहीं मानते। उनका दृढमत है कि कर्तव्य से ही अधिकार किया जा सकता है।

चिंतन की सर्वधर्म समभाव परम्परा के वे संवाहक हैं। व्यवस्था परिवर्तन अभियान के लिए अपना तन-मन-धन सर्वस्व न्यौछावर करते हुए प्राकृति जीवन शैली में जीवन निर्वाह करते हुए ऋषिकेश स्थित गंगा-वाटिका निवास स्थान पर वे इस अभियान को गति दे रहे हैं। रात-दिन, सोते-बैठते, यही चिंता रहती है कि व्यवस्था परिवर्तन शीघ्राति-षीघ्र कैसे हो और मर्यादा का जीवन सबको सुलभ हो। वे देश-व्यापी पत्राचार, गौष्ठी, परिसंवाद, सम्मेलन तथा देश के विभिन्न प्रदेशों में संगठन खडा कर रहे हैं।

व्यवस्था परिवर्तन आंदोलन में भारत के समस्त जन (125 करोड से भी अधिक) का सामूहिक स्वार्थ जुडा हुआ है। इस कारण प्रति जन यदि अपना अमूल्य सहयोग देकर, परिवर्तन की इस प्रयण्ड तुफानी वेग की गति में शामिल होनेको इच्छुक है उसका सदा सर्वदा वे स्वागत करते हैं।

इसी तरह के सामाजिक कार्यो में निरंतर गतिशील श्री वात्सल्य जी की मुलाकात श्री आचार्य पंकज जी के माध्यम से ज्ञान यज्ञ एवं व्यवस्था परिवर्तन अभियान के प्रणेता प्रख्यात विचारक श्री बजरंग मुनि जी से हुई और दोनों जन की एक प्रकार की तडप एक साथ कार्य करने के लिए प्रेरित कर दिया और तभी से श्री प्रमोद कुमार वात्सल्य जी ’’ज्ञान यज्ञ’’ एवं व्यवस्था परिवर्तन अभियान कमेटी के ’’संरक्षक’’ के रूप में जुड कर कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए प्रयासरत रहते है। आपके द्वारा इस उम्र में भी युवा जैसी सक्रियता एवं लगन षील कार्य एवं मार्गदर्शन करने के लिए ’’ज्ञान यज्ञ’’ परिवार हृदय से आभार प्रकट करते हुए आपके द्वारा किये गये सफलतम कार्य के लिए बहुत-बहुत शुभकामनायें।

– श्री अभ्युदय द्विवेदी, राष्ट्रीय संयोजक, “ज्ञान-यज्ञ” परिवा