सनातन धर्म के चार वेदों का संक्षिप्त विवरण

भारत में वेदों का महत्वपूर्ण स्थान है। ये प्राचीन ज्ञान के स्रोत हैं। वेदों को चार भागों में बांटा गया है- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। वेदों की रचना प्राचीन काल के ऋषि मुनियों ने की थी। ऐसा माना जाता है कि ईश्वर ने ऋषि-मुनियों को जो ज्ञान दिया उसे वे लिपिबद्ध करते गए जो आगे चलकर वेद के रूप में जाने गए।

माना जाता है कि ब्रह्मा जी के चार मुख से चार वेद बने। वेद सबसे प्राचीन पुस्तकें हैं। इन्हें सबसे प्राचीन लिखित ग्रंथ माना जाता है। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियों भारत के पुणे में “भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट” में रखी हुई है। ऋग्वेद की 30 हजार पांडुलिपियों बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन्हें यूनेस्को की विरासत सूची में शामिल किया गया है।

साधारण भाषा में वेद का अर्थ ज्ञान होता है। इनके अंदर मनुष्य की सभी समस्याओं का समाधान मिलता है। वेदों में औषधि, संगीत, देवताओं, हवन, भूगोल, गणित, ज्योतिष, ब्रह्मांड धर्म के नियम, रीति रिवाज, इतिहास सभी के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है।

यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई० पू० के समय की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया है।

वेदों के उपवेद: वेदों को अनेक उपवेदो में भी विभक्त किया गया है। ऋग्वेद को आयुर्वेद, यजुर्वेद को धनुर्वेद, अथर्ववेद को स्थापत्यवेद, सामवेद को गंधर्ववेद में बाटा गया है।

ऋग्वेद : इसके साथ ही ऋग्वेद में हवन द्वारा चिकित्सा, जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, मानस चिकित्सा की जानकारी भी दी गई है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त की जानकारी मिलती है जिसमें दवाओं के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसमें 125 प्रकार की औषधियों के बारे में बताया गया है जो 107 स्थानों पर पाई जाती हैं। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने की कहानी भी मिलती है।

यह सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इसे पद्य शैली (कविता के रूप में) लिखा गया है। ऋग्वेद में 10 मंडल, 1028 सूक्त, 10580 ऋचाये हैं। ऋग्वेद ऋक शब्द रूप से बना है जिसका अर्थ स्थिति और ज्ञान होना है। इस ग्रंथ में देवताओं के आवाहन के मंत्रों,  देवलोक में उनकी स्थिति के बारे में बताया गया है।

यजुर्वेद : तत्व विज्ञान के बारे में भी चर्चा की गई है। ब्राह्मण, आत्मा, ईश्वर और पदार्थ के ज्ञान के बारे में जानकारी मिलती है। यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं- कृष्ण यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद दक्षिण भारत में और शुक्ल यजुर्वेद उत्तर भारत में प्रचलित है। यजुर्वेद में कुल 18 कांड हैं 3988 मंत्र हैं

यजुर्वेद  शब्द यत् + जु = यजु से मिलकर बना है। यत का अर्थ गतिशील और जु का अर्थ आकाश होता है। इस तरह यजुर्वेद का अर्थ आकाश में गतिशील होने से है। इसमें श्रेष्ठ कर्म करने पर जोर दिया गया है। यजुर्वेद में यज्ञ करने की विधियां और प्रयोग के बारे में बताया गया है।

सामवेद: सामवेद साम शब्द से बना है इसका अर्थ रूपांतरण, संगीत, सौम्यता और उपासना होता है। सामवेद में ऋग्वेद की रचनाओं को संगीतमय रूप में प्रस्तुत किया गया है। सामवेद को गीतात्मक (गीतों के रूप में) लिखा गया है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। इसमें 1824 मंत्र हैं जिसमें इंद्र, सविता, अग्नि जैसे देवताओं का वर्णन है। सामवेद की 3 शाखाएं हैं। इसमें 75 ऋचाये हैं।

अथर्व वेद : अथर्व शब्द थर्व+ अथर्व शब्द से मिलकर बना है। थर्व का अर्थ कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन होता है। इस वेद में रहस्यमई विद्याओं, चमत्कार, जादू टोने, आयुर्वेद जड़ी बूटियों का वर्णन मिलता है। इसमें कुल 20 अध्याय में 5687 मंत्र हैं। अथर्ववेद आठ खंड में विभाजित है। इसमें भेषज वेद और धातु वेद दो प्रकार मिलते हैं।

वेदों का महत्व : वेदों से हमें विभिन्न जानकारियां मिलती हैं। कुछ प्रमुख जानकारियां इस प्रकार हैं-

वर्ण एवं आश्रम पद्धतियां की जानकारी: वेदों में मनुष्य को 4 पुरुषार्थ के बारे में बताया गया है। इसे चार आश्रम भी कहते हैं। पहला आश्रम ब्रह्मचर्य माना गया है जिसमें व्यक्ति उपनयन संस्कार (जनेऊ) को धारण करता है। ब्रह्मचर्य आश्रम में व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करता है। वह अपनी इच्छा और भावनाओं को अनुशासन में रखता है। गुरु के आश्रम में रहता है और गुरु की आज्ञा का पालन करता है।

दूसरा आश्रम गृहस्थ आश्रम है। इसे मनुष्य के जीवन का महत्वपूर्ण चरण माना गया है। इसमें व्यक्ति विवाह करता है और काम का व्यवहार करता है। वह संतान उत्पत्ति करता है और समाज के कर्तव्यों का पालन करता है। इसके बाद व्यक्ति वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करता है इसमें व परिवार का त्याग कर देता है और जंगल में जाकर सांसारिक विषयों से दूर हो जाता है।

रीति रिवाज एवं परंपराओं का वर्णन: चारों वेदों में हिंदू धर्म के प्राचीन रीति रिवाज और परंपराओं का वर्णन मिलता है। आदर्श व्यवहार किस तरह का होना चाहिए इसका वर्णन मिलता है। बुरे कर्मों का फल बुरा होता है और अच्छे कर्मों का फल अच्छा होता है। व्यक्ति को धर्म के अनुसार जीवन जीना चाहिए। बुराइयों से दूर रहना चाहिए। धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष को माना गया है।

विभिन्न व्यवसाय के बारे में वर्णन: वेदों में योद्धा, पशुपालक, पुजारी, शिल्पका,र किसान जैसे व्यवसाय के बारे में वर्णन मिलता है। वेदों में चार प्रकार की जाति व्यवस्था का वर्णन मिलता है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। समाज में सभी के लिए के लिए अलग-अलग काम निर्धारित थे। ब्राह्मणों का मुख्य काम वेदों का अध्ययन करना, यज्ञ करना, पुरोहित पुजारी का काम करना, शिक्षक का काम करना था। वह दूसरे लोगों से दक्षिणा स्वीकार करते थे। क्षत्रियों का मुख्य काम युद्ध करना था। उन्हें समाज की रक्षा करने का काम दिया गया था। वैश्य जाति का मुख्य काम व्यापार करना था। इसके अलावा पशुपालन, खेती, शिल्प और दूसरे व्यापारों को वैश्य करते थे।

आवश्यक टिपण्णी : यहाँ पर शूद्रों के बारे में बात करनी अति आवश्यक है क्योंकि इस बारे में समय के साथ साथ समाज में बहुत सी भ्रांतियां व्याप्त की गयी। शूद्र का मतलब ‘ निचले’ दर्जे के काम करना नहीं था। शूद्र का मतलब था समाज में कई आवश्यक कार्य जैसे कि सफाई, जूते बनाने का कार्य, लोहार, धोबी आदि। असल में हम इसे इस प्रकार समझ सकते हैं। जैसे अगर वैश्य जाति में कोई बहुत पढ़ लिख गया तो वो ब्राह्मण कार्यक्षेत्र में आ गया या कोई ब्राह्मण अगर नहीं पढ़ा लिखा और लोहार बन गया तो वह शूद्र हो गया। यह साड़ी वयवस्था जाति सूचक नहीं बल्कि कार्य सूचक या कार्य बोधक है। हाँ, समाज ने हज़ारों वर्षों में इसे एक विकृत रूप दे कर शूद्र को एक जाती बना दिया और उन पर बहुत मानसिक, सामाजिक व् आर्थिक अत्याचार किये। किसी भी सभ्य समाज में जाति का वर्णन ही गलत है और जाति उपनाम का प्रयोग ही कानूनन दंडनीय अपराध होना चाहिए। समाज के इस कलंक को पूरणतया समाप्त करने के लिए आज के युवा की सोच का ऊंचा उठना आवश्यक है ।

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